काठमांडू: विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने नेपाल सरकार को सुप्रीम कोर्ट की न्यायधीशों की नियुक्तियों और उसकी संरचना में किसी भी प्रकार के राजनीतिक हस्तक्षेप से बाज आने के लिए कड़े शब्दों में आगाह किया है, इसे देश के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया है। एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International), ह्यूमन राइट्स वॉच (Human Rights Watch) और इंटरनेशनल कमीशन ऑफ ज्यूरिस्ट्स (ICJ) द्वारा शुक्रवार को जारी किए गए एक संयुक्त बयान में यह कहा गया है कि नेपाल सरकार की ओर से हालिया समय में उठाए गए कदम देश की स्वतंत्र न्यायपालिका के अस्तित्व को खतरे में डाल रहे हैं।

क्या जजों पर इस्तीफे और महाभियोग का बनाया जा रहा है दबाव?

संयुक्त बयान में यह गंभीर बात सामने लाई गई है कि नेपाल में मौजूदा न्यायाधीशों से जबरन इस्तीफे लेने अथवा महाभियोग का खौफ दिखाकर सुप्रीम कोर्ट की पूरी संरचना को बदलने के लिए राजनीतिक स्तर पर भारी दबाव डाले जाने की खबरें लगातार आ रही हैं।

  • मई 2026 के दौरान नेपाल के संविधान और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के तहत आवश्यक संसदीय कानूनों को दरकिनार करते हुए, एक कार्यकारी अध्यादेश (Executive Ordinance) के माध्यम से संवैधानिक परिषद अधिनियम में संशोधन किए जाने के कदम को इन अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने पूरी तरह से अनुचित और गैर-कानूनी करार दिया है।

  • इन प्रमुख मानवाधिकार समूहों ने प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह के नेतृत्व वाली सरकार को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि वह जजों पर अनैतिक दबाव बनाना तुरंत बंद करे और देश की न्यायिक स्वतंत्रता के साथ खिलवाड़ करने से बाज आए।

क्या मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति में तोड़ी गई वरिष्ठता की परंपरा?

मानवाधिकार संगठनों का यह भी मानना है कि सुप्रीम कोर्ट में तीन योग्य और वरिष्ठ न्यायाधीशों के पद पर मौजूद होने के बावजूद मनोज कुमार शर्मा को मुख्य न्यायाधीश के पद पर नियुक्त किया गया, जो नेपाल की वर्षों पुरानी और स्थापित वरिष्ठता की परंपरा का खुला उल्लंघन है।

किन-किन न्यायाधीशों को बनाया जा रहा है निशाना?

मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल की न्यायपालिका की वरिष्ठ न्यायाधीश सपना प्रधान मल्ला, कुमार रेग्मी और हरि फुयाल पर अपने पदों से इस्तीफा देने के लिए प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से भारी दबाव बनाया जा रहा है। इन जजों पर यह गंभीर आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि यदि वे स्वेच्छा से इस्तीफा देने से इनकार करते हैं, तो उन्हें संसद के माध्यम से महाभियोग (Impeachment) चलाए जाने की सीधी धमकियां दी जा रही हैं।