परिक्रमा मार्ग परिवर्तन पर विवाद, श्रद्धालुओं ने जताई आपत्ति
ओंकारेश्वर। नर्मदा तट पर स्थित पावन तीर्थनगरी ओंकारेश्वर में इन दिनों धार्मिक परंपराओं और आधुनिक विकास के बीच एक बड़ा गतिरोध पैदा हो गया है। सदियों पुरानी ओंकार पर्वत परिक्रमा के मार्ग में किए गए बदलाव ने देश के कोने-कोने से आने वाले श्रद्धालुओं और स्थानीय निवासियों के बीच भारी असंतोष पैदा कर दिया है। वर्षों से जिस सात किलोमीटर लंबे पथ पर श्रद्धालु अपनी आस्था की डगर नापते आए थे, उसे निर्माण कार्यों के चलते बंद कर दिए जाने से अब साधु-संत और आम नागरिक सड़क पर उतरकर विरोध जता रहे हैं। लोगों का स्पष्ट कहना है कि विकास की गति तो आवश्यक है, किंतु यह किसी भी सूरत में करोड़ों लोगों की धार्मिक भावनाओं और प्राचीन मान्यताओं की बलि देकर नहीं होनी चाहिए।
प्राचीन परिक्रमा पथ और श्रद्धालुओं की बढ़ती असुविधा
ओंकार पर्वत की परिक्रमा का विशेष आध्यात्मिक महत्व माना जाता है और प्रतिदिन हजारों भक्त भगवान शिव की कृपा पाने हेतु इस पथ पर चलते हैं, परंतु मार्ग परिवर्तन ने उनकी श्रद्धा की राह में बाधाएं उत्पन्न कर दी हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार शंकराचार्य संग्रहालय और अन्य परियोजनाओं के कारण पुराने मार्ग को पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया गया है, जिससे अब भक्तों को एक नए और अत्यंत दुर्गम रास्ते का उपयोग करना पड़ रहा है। इस व्यवस्था से सबसे अधिक कष्ट बुजुर्गों और महिला श्रद्धालुओं को उठाना पड़ रहा है क्योंकि नया मार्ग न केवल कठिन है बल्कि बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित है, जिसके परिणामस्वरूप कई श्रद्धालुओं ने अब भारी मन से यहाँ की यात्रा तक कम कर दी है।
विकास परियोजनाओं के बीच आस्था के संरक्षण की चुनौती
प्रदेश सरकार द्वारा ओंकार पर्वत पर आदिगुरु शंकराचार्य की विशाल प्रतिमा की स्थापना और हजारों करोड़ रुपये के विकास कार्यों के माध्यम से इसे वैश्विक पर्यटन केंद्र बनाने का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन इन भव्य योजनाओं के क्रियान्वयन के तरीके पर अब सवाल उठ रहे हैं। कई स्थानीय नागरिकों और जानकारों का मानना है कि निर्माण कार्यों की धीमी गति और बिना किसी ठोस वैकल्पिक योजना के रास्तों को बंद करने से क्षेत्र के प्राकृतिक और धार्मिक स्वरूप को अपूरणीय क्षति पहुँच रही है। प्रशासन और जनता के बीच बढ़ता यह विवाद अब केवल एक रास्ते तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह आस्था और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाए रखने की एक गंभीर चुनौती बन गया है जिससे भविष्य में तीर्थयात्रियों की संख्या पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
साधु-संतों का कड़ा रुख और परंपरा बचाने की पुकार
ओंकारेश्वर के विद्वान पंडितों और साधु-संतों ने परिक्रमा मार्ग को खंडित किए जाने पर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराते हुए इसे धर्म विरुद्ध कदम बताया है। विद्वानों का तर्क है कि ओंकार पर्वत की परिक्रमा अनादिकाल से चली आ रही एक अखंड परंपरा है जिसे प्रशासनिक आदेशों से बदलना श्रद्धालुओं की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। संतों का आरोप है कि प्राचीन धरोहरों और मान्यताओं को विकास के नाम पर किनारे किया जा रहा है और जिम्मेदार अधिकारी इस विषय की गंभीरता को समझने के बजाय इसे नजरअंदाज कर रहे हैं। वर्तमान में यह मांग जोर पकड़ रही है कि प्रशासन को तुरंत हस्तक्षेप कर धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करते हुए श्रद्धालुओं के लिए सुगम और परंपरागत मार्ग की उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए।
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