विपक्षी एकजुटता की कमी ने बिगाड़ा ममता का खेल, सियासी समीकरण बदले
कोलकाता: हाल ही में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने भारतीय राजनीति की इस कड़वी हकीकत को एक बार फिर पुरजोर तरीके से साबित कर दिया है कि एक मजबूत विपक्षी एकजुटता के बिना चुनाव जीतना नामुमकिन है। पश्चिम बंगाल में सामने आए चुनावी आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि राज्य में सत्तारूढ़ रही तृणमूल कांग्रेस (TMC) को भारतीय जनता पार्टी विरोधी वोटों के आपसी बिखराव के कारण लगभग तीन दर्जन विधानसभा सीटों का बहुत भारी नुकसान उठाना पड़ा है। सूबे की कुल 294 विधानसभा सीटों के अंतिम परिणाम के विश्लेषण से यह पूरी तरह साफ होता है कि भाजपा ने अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए 207 सीटें जीती हैं और राज्य के इतिहास में पहली बार सबसे बड़े दल के रूप में उभरकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई है। इसके विपरीत, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी के खाते में महज 80 सीटें ही आ सकी हैं, जबकि राष्ट्रीय दल कांग्रेस को केवल 2 और वाममोर्चा (लेफ्ट) को महज 1 सीट पर ही संतोष करना पड़ा है।
कांग्रेस-टीएमसी गठबंधन न होने का दिखा असर, दर्जनों सीटों पर बिगड़ा खेल
राजनैतिक विश्लेषकों और चुनाव विज्ञान के विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव की घोषणा से पहले जमीनी हकीकत को भांपते हुए कांग्रेस और अन्य धर्मनिरपेक्ष दलों के साथ एक मजबूत चुनावी गठबंधन कर लिया होता, तो आज पश्चिम बंगाल की पूरी सियासी तस्वीर और सत्ता का संतुलन बिल्कुल अलग हो सकता था। प्रदेश की एक दर्जन से भी अधिक अति-संवेदनशील सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवारों ने टीएमसी के पारंपरिक वोट बैंक में सीधे सेंध लगाकर उसके चुनावी समीकरण को जमींदोज कर दिया। साल 2021 के पिछले विधानसभा चुनाव में इन सीटों में से 10 पर टीएमसी ने एकतरफा जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार इन खास सीटों पर कांग्रेस को मिले कुल वोट टीएमसी और भाजपा के बीच रहे हार-जीत के वास्तविक अंतर से भी कहीं अधिक पाए गए हैं। इतना ही नहीं, करीब छह विधानसभा क्षेत्र ऐसे भी चिन्हित किए गए हैं जहाँ टीएमसी को सीधे तौर पर 'नोटा' (NOTA) के कारण पराजय का मुंह देखना पड़ा, क्योंकि उन क्षेत्रों में कांग्रेस को नोटा के मुकाबले कहीं अधिक वोट हासिल हुए थे।
मुस्लिम बहुल इलाकों में भी बिखरा वोट बैंक, मालदा और मुर्शिदाबाद में बीजेपी की सेंधमारी
वोटों के इस बहुकोणीय बिखराव का सबसे बड़ा और सीधा फायदा भाजपा को राज्य के उन मुस्लिम बहुल सीमावर्ती क्षेत्रों में भी मिला, जिन्हें अब तक टीएमसी का सबसे सुरक्षित अभेद्य किला माना जाता था। मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जिलों की कुल 43 विधानसभा सीटों में से भाजपा ने अप्रत्याशित रूप से 20Target सीटें अपनी झोली में डाल ली हैं। इस ऐतिहासिक उलटफेर का मुख्य कारण यह रहा कि इन जिलों का अल्पसंख्यक मतदाता इस बार केवल टीएमसी के पाले में न रहकर कांग्रेस, लेफ्ट, इंडियन सेकुलर फ्रंट (ISF) और अन्य छोटे क्षेत्रीय दलों के बीच कई हिस्सों में पूरी तरह विभाजित हो गया। इसकी तुलना में अगर साल 2021 के आंकड़ों को देखें, तो यह वोट बैंक पूरी तरह से टीएमसी के पक्ष में लामबंद था, जिसके दम पर पार्टी ने इन 43 में से 35 सीटों पर बंपर जीत हासिल की थी और तब भाजपा केवल आठ सीटों पर ही सिमट कर रह गई थी।
लेफ्ट का 7 फीसदी वोट बैंक आज भी मजबूत, क्षेत्रीय दलों को राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट होने की सीख
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक और महत्वपूर्ण पहलू वामदलों (लेफ्ट) की जमीनी मौजूदगी है, जिनके पास आज भी तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद लगभग सात प्रतिशत का एक बेहद वफादार और मजबूत कोर वोट बैंक मौजूद है। राजनैतिक पंडितों का आकलन है कि पूरे राज्य में कई दर्जन सीटें ऐसी हैं, जहाँ लेफ्ट और कांग्रेस के प्रत्याशियों को मिले संयुक्त वोटों की संख्या टीएमसी की हार के कुल अंतर से बहुत ज्यादा है। चुनाव परिणामों के इस कड़े सबक के बाद अब विपक्षी खेमे के राष्ट्रीय और प्रांतीय नेताओं के भीतर यह सुगबुगाहट तेज हो गई है कि सभी क्षेत्रीय दलों को अपने व्यक्तिगत मतभेदों को दरकिनार कर धरातल की कड़वी सच्चाई को स्वीकार करना होगा। नेताओं का कहना है कि यदि देश में भाजपा के विजय रथ को रोकना है, तो न केवल आगामी लोकसभा चुनावों में बल्कि भविष्य के सभी राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी विपक्षी दलों को बहुत बेहतर तालमेल, सीट शेयरिंग और एक ठोस साझेदारी के साथ मैदान में उतरना होगा, क्योंकि मतों का ऐसा ही आत्मघाती विभाजन इससे पहले गुजरात और दिल्ली के चुनावों में भी विपक्ष को पूरी तरह नेस्तनाबूद कर चुका है।
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